ट्रम्प फिर से नाटो का इस्तेमाल दबाने के एक औज़ार की तरह कर रहे हैं ताकि यूरोपीय साझेदार उनकी मर्जी मान लें। अमेरिका ने ईरान पर हमला किया और उसके जवाब में ईरान ने हॉर्मुज़ जलडमरूमध्ये मालवाहक मार्ग अवरुद्ध कर दिया। तेल की कीमतें बढ़ रही हैं और अब ट्रम्प चाहते हैं कि यूरोप उनकी बनाई हुई समस्या को सुलझाने में आगे आए। पर यूरोप को ऐसा नहीं करना चाहिए।

क्या हुआ और क्या नतीजे निकले

संघर्ष की शुरुआत के बाद हालात खराब होते गए। ईरान ने खाड़ी में अमेरिकी और उनके सहयोगी संसाधनों को निशाना बनाया। अब तक कम-से-कम 13 अमेरिकी सैनिक मारे गए हैं, जबकि ईरानी नागरिकों में मृत्यु संख्या 1,200 से अधिक बताई जा रही है।

अमेरिका ने युद्ध के पहले 12 दिनों में करीब $16.5 बिलियन खर्च कर दिए। यह राशि कुछ देशों की मानवीय सहायता बजट जितनी है। साथ ही तेल की महंगाई से यूरोप और एशिया के कुछ हिस्सों में मंदी का खतरा पैदा हो सकता है।

यूरोप की प्रतिक्रिया

अधिकांश यूरोपीय सरकारें ट्रम्प की अपील पर नकारात्मक रुख रख रही हैं। जर्मन रक्षा मंत्री के शब्दों में, "यह हमारी जंग नहीं है। हमने इसे शुरू नहीं किया।" कुछ नेता, जैसे यूनाइटेड किंगडम के प्रधानमंत्री, ने क्षेत्र में नौवहन की स्वतंत्रता बहाल करने वाले उपायों पर विचार करने की बात कही है।

ईयू के उच्च प्रतिनिधि काजा काल्लास ने रेड सी में चल रहे एक नौसैनिक अभियान के मण्डेट को हॉर्मुज़ तक फैलाने का सुझाव दिया, पर अभी कई सरकारें इस विचार के खिलाफ हैं। यूरोपीय बलों की खाड़ी में तैनाती होने पर ईरान उन्हें भी निशाना बना सकता है, और इससे यूरोपीय देशों का सीधे शामिल होना सम्भव है।

यूरोप को इसमें क्यों शामिल नहीं होना चाहिए

  • मुख्य खतरा रूस है: यूरोप के लिए सबसे बड़ा सुरक्षा खतरा अभी भी रूस है। रूस ने यूक्रेन पर पूर्ण पैमाने पर आक्रमण किया हुआ है और यह अवसंरचना पर हमला, आगजनी, तोड़फोड़ और गलत सूचना के जरिये यूरोपीय समाज को कमजोर करने का प्रयास कर रहा है। खुफिया आकलन बताते हैं कि मध्यम अवधि में रूस किसी नाटो देश की क्षेत्रीय अखंडता को भी चुनौती दे सकता है। यूरोप को वही रोकना है।
  • जन समर्थन खोने का जोखिम: पश्चिमी यूरोप में सरकारें जनता से कठिन आर्थिक फैसलों के लिए समर्थन जुटाने की कोशिश कर रही हैं ताकि रक्षा खर्च बढ़ाया जा सके। अगर यूरोपीय देश अनिच्छा से खाड़ी में युद्ध में शामिल हो गए तो जनता का भरोसा और समर्थन घट जाएगा।
  • कानूनी और लोकप्रिय विरोध: अमेरिका और इजरायल की हालिया कार्रवाई अवैध और जनता में नापसंद है। यूके और जर्मनी में लगभग 60% लोग इस युद्ध के खिलाफ हैं। इटली और फ्रांस में भी बड़ी हिस्सेदारी विरोध में है।

यूरोप को क्या करना चाहिए

यूरोपीय सरकारों का लक्ष्य स्पष्ट होना चाहिए: सीधी सैन्य भागीदारी से बचना और संघर्ष को और बढ़ाने से रोकना। ठोस कदम कुछ इस तरह होने चाहिए:

  • संयमित कूटनीति: ट्रम्प और अमेरिकी प्रशासन पर दबाव डालना कि वे युद्ध की तीव्रता कम करने और वैकल्पिक राजनयिक रास्ते अपनाने की कोशिश करें।
  • रक्षात्मक रूपरेखा: पूर्वी भूमध्यसागरीय और खाड़ी में तैनात यूरोपीय बलों को मिसाइल इंटरसेप्ट और अपने सैनिकों की रक्षा पर ध्यान देना चाहिए, न कि बड़े पैमाने पर और नए बल भेजने पर।
  • सार्वजनिक समर्थन बनाए रखना: अगर यूरोप नेतृत्व चाहता है कि जनता अधिक रक्षा खर्च को मान्यता दे तो उसे इस तरह की अनावश्यक सैन्य भागीदारी से दूरी बनाये रखना होगा।

निष्कर्ष

ट्रम्प की यह माँग पहली बार नहीं आई है। पहले भी वह मदद रोकने या नाटो को चुनौती देने जैसा दबाव बना चुके हैं और कई बार यूरोप ने खुद अंतर को भर लिया या ट्रम्प पीछे हटा। इस मौके पर भी यूरोपीय सरकारों को आत्मविश्वास के साथ कहना चाहिए कि वे इस युद्ध में शामिल नहीं होंगी, सिवाय कूटनीतिक उपायों का समर्थन करने के। यही रास्ता है अगर वे अपने सुरक्षा लक्ष्य और घरेलू सहमति दोनों को बचाना चाहते हैं।

लेख में प्रस्तुत तर्क और आंकड़े सार्वजनिक पोलिंग और रिपोर्टों पर आधारित संक्षेप हैं।