बुडापेस्ट से निकला राजनीतिक संकेत
बुडापेस्ट में जेडी वेंस ने ब्रसेल्स के “नौकरशाहों” पर हंगरी के चुनाव से पहले दखल देने का आरोप लगाकर एक बार फिर यह साफ कर दिया कि विक्टर ऑर्बान की लड़ाई अब सिर्फ घरेलू नहीं रह गई है। दूसरी तरफ, रविवार के चुनाव में ऑर्बान के प्रतिद्वंद्वी ने व्हाइट हाउस पर हस्तक्षेप का आरोप लगाया। यानी आरोप-प्रत्यारोप का स्तर इतना ऊँचा है कि लोकतंत्र से ज्यादा यह बहस सत्ता के चारों ओर खींची गई रस्साकशी लगती है।
ऑर्बान ने मैदान पहले ही सजाया था
यह कहानी अचानक नहीं बनी। पिछले कुछ दिनों में प्रकाशित रिपोर्टों ने दिखाया कि ऑर्बान ने अपने संभावित उत्तराधिकारी के लिए रास्ता पहले से कठिन कर दिया है। उनके वफ़ादार लोग ऐसे अहम सार्वजनिक संस्थानों में बैठाए गए हैं, जो किसी नए प्रधानमंत्री के बजट और कानूनों को रोकने की ताकत रखते हैं। सरल भाषा में कहें तो अगर मतदाताओं ने बदलाव चुन भी लिया, तो व्यवस्था उससे सहमत हो, यह ज़रूरी नहीं। बहुत व्यावहारिक व्यवस्था है, बस थोड़ी अधिक चुनी हुई सरकारों से असहज रहने वाली।
चुनाव, लेकिन बराबरी वाला नहीं
1 अप्रैल की रिपोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि हंगरी में चुनावों को निष्पक्ष कहना आसान नहीं है। विपक्ष का तर्क है कि राज्य तंत्र और मीडिया पर ऑर्बान का इतना नियंत्रण है कि वह चुनावी माहौल को अपने पक्ष में मोड़ सकते हैं। जब नियम, संस्थान और सूचना का प्रवाह, तीनों एक ही दिशा में झुकने लगें, तो मुकाबला बराबरी का रह ही नहीं जाता।
यही कारण है कि ऑर्बान के विरोधी उन्हें सिर्फ एक लोकप्रिय नेता नहीं, बल्कि एक ऐसी राजनीतिक मशीन मानते हैं जो मतदान से पहले ही नतीजों की जमीन तैयार कर देती है।
ब्रसेल्स से बुडापेस्ट, और फिर मास्को तक
30 मार्च की रिपोर्ट ने ऑर्बान की लंबी राजनीतिक यात्रा को भी याद दिलाया, जहाँ वे कभी उदारवादी असंतुष्ट माने जाते थे, और अब एमएजीए खेमे के प्रिय चेहरे बन चुके हैं। इस बीच, उनकी सरकार हंगरी को फिर से मास्को के प्रभाव-वृत्त में लौटाने के लिए भी आलोचना झेलती रही है। यूरोपीय संघ के भीतर रहते हुए रूस के साथ इतने करीबी संबंध बनाना कोई खास सूक्ष्मता का काम नहीं है, लेकिन ऑर्बान ने इसे भी एक राजनीतिक पहचान में बदल दिया।
यही उनकी असली चाल है। वे खुद को ब्रसेल्स, वाशिंगटन और घरेलू उदारवादियों के विरुद्ध खड़े एक मजबूत नेता के रूप में पेश करते हैं। उनके समर्थकों के लिए यह संप्रभुता है। उनके आलोचकों के लिए यह संस्थागत कब्ज़ा। और तथ्य, हमेशा की तरह, बीच में खड़े हैं और दोनों तरफ से खींचे जा रहे हैं।
वेंस की यात्रा क्यों मायने रखती है
7 अप्रैल को वेंस का बुडापेस्ट में ऑर्बान के पक्ष में बोलना केवल एक औपचारिक दौरा नहीं था। यह संकेत था कि हंगरी का चुनाव अब अंतरराष्ट्रीय दक्षिणपंथी राजनीति का भी हिस्सा बन चुका है। एक तरफ यूरोपीय संघ पर हमले, दूसरी तरफ व्हाइट हाउस पर आरोप, और बीच में ऑर्बान का सत्ता-तंत्र, यह सब मिलकर एक ऐसा दृश्य बनाते हैं जिसमें लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा से ज्यादा, गठबंधनों की राजनीति चमक रही है।
और यही ऑर्बान की दुविधा भी है, और ताकत भी। वे ऐसे नेता हैं जिनके पास घरेलू नियंत्रण है, लेकिन साथ ही उन्हें बाहरी वैधता की भी ज़रूरत है। जब बुडापेस्ट में जेडी वेंस जैसे नेता खड़े होकर ब्रसेल्स पर तंज कसते हैं, तो वह सिर्फ भाषण नहीं होता। वह एक चुनावी संदेश होता है, और शायद एक तरह की चेतावनी भी।



