एक नई राह: निजी उपचारों की झंझट कम?

यूनिवर्सिटी ऑफ पennsylvania के नेतृत्व में किए गए शोध में विकसित नैनोपार्टिकल्स ने संभावित रूप से सार्वभौमिक इम्यूनोथेरेपी की दिशा खोली है। यह तरीका उन महंगी और समय लेने वाली व्यक्तिगत उपचारों की जरूरत को घटा सकता है जिन पर अभी कई कैंसर रोगियों का भरोसा है। ये नतीजे Nature Nanotechnology में प्रकाशित हुए हैं।

नैनोपार्टिकल्स क्या करती हैं?

सरल शब्दों में, ये कण इम्यून सेल्स को दो तरह से मदद पहुंचाते हैं:

  • ट्यूमर के प्रतिकूल माहौल में फंसकर कमजोर हो रही टी कोशिकाओं को फिर से सक्रिय करते हैं।
  • एक ही समय में कोशिकाओं को जरूरी संकेत और संसाधन देते हैं ताकि वे ट्यूमर पर हमला कर सकें।

शोधकर्ता इस व्यवहार को समझाने के लिए कह रहे हैं कि नैनो कण ऐसे हैं जो टी कोशिकाओं से 'ब्रेक' हटाते हैं और साथ में उन्हें 'ईंधन' भी देते हैं। यह तुलना सरल है पर काम को अच्छी तरह बयान करती है।

कैसे काम करते हैं ये नैनो कण?

योजना में बने नैनो कणों में दो अलग- अलग कार्गो होते हैं:

  • एक दवा जो रोकती है वह एंजाइम जिसे ट्यूमर बनाकर इम्यून गतिविधि को कम कर देता है।
  • एक mRNA अणु जो कोशिकाओं को निर्देश देता है कि वे एक ऐसी प्रोटीन बनाएं जो इम्यून सिस्टम को सक्रिय करे।

इन दोनों सामग्रियों का एक साथ पहुंचना टी कोशिकाओं की कार्यक्षमता दोनों तरीके से सुधारता है: ट्यूमर की दमनशील क्रियाओं को घटाकर और प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को बढ़ाकर।

जानवरों पर किए गए परीक्षण और नतीजे

माउस मॉडल में मिले परिणाम उत्साहजनक रहे:

  • कोलन ट्यूमर लगभग 30 दिनों में बहुत कम हो गया या समाप्त हो गया।
  • उपचारित जानवरों ने पुनरावृत्ति के विरुद्ध प्रतिरोध दिखाया।
  • जिन माउस में दो अलग-अलग ट्यूमर थे, उनमें से एक में नैनोपार्टिकल्स की इंजेक्शन ने दूसरे ट्यूमर में भी कमी ला दी।

क्या अब तुरंत इंसानों पर प्रयोग होंगे?

यहां थोड़ा ठहराव जरूरी है। ये परिणाम प्राग्लानिक परीक्षणों पर आधारित हैं, यानी अभी इंसानी अध्ययनों की आवश्यकता है। शोध के प्रमुख सदस्य Michael J. Mitchell और प्रथम लेखक Qiangqiang Shi ने इस काम के संभावित लाभ बताए हैं, पर अगले चरणों में सुरक्षा और प्रभावशीलता की और जांच करनी होगी।

कुल मिलाकर: नतीजे वादा दिखाते हैं। यह एक ऐसी रणनीति है जो टी कोशिकाओं की जलती हुई ताकत को बहाल कर सकती है और कैंसर के खिलाफ हमारी प्रतिरक्षा को मजबूत बना सकती है। पर असल मुकाबला अभी भविष्य के क्लिनिकल ट्रायल्स में होना है।

थोड़ी उम्मीद, थोड़ा धैर्य — विज्ञान में यही नियम है।