भीतर से चल रही बहस

अमेरिका और इज़राइल के ईरान पर युद्ध के पहले महीने में हौथियों ने अपेक्षाकृत सावधानी बरती। बहुतों ने उनसे तेज़ प्रतिक्रिया की उम्मीद की थी, क्योंकि उनकी तेहरान से नज़दीकी किसी से छिपी नहीं है। यह आकलन पूरी तरह गलत भी नहीं है। रिश्ते वाकई मज़बूत हैं। लेकिन जो बात अक्सर छूट जाती है, वह यह कि यमनी समूह के भीतर फ़ैसले अब काफ़ी हद तक लंबी आंतरिक बहस का नतीजा होते हैं।

यह बहस नई नहीं है। इसकी जड़ें उस फ़ैसले तक जाती हैं, जब हौथियों ने 7 अक्टूबर 2023 को अल-अक्सा फ़्लड अभियान के बाद गाज़ा के समर्थन में सैन्य कार्रवाई शुरू की थी। फिर मार्च 2025 में अमेरिका और इज़राइल ने जवाबी हमले किए, जो दो महीने चले। मई में ओमान की मध्यस्थता से एक समझौता हुआ और लड़ाई थम गई। उस अनुभव ने संगठन पर गहरा असर छोड़ा।

पुराने अनुभव का हिसाब

हौथी नेतृत्व के कुछ लोग मानते हैं कि पिछले दो वर्षों में इस दख़ल की क़ीमत बहुत भारी रही। बात सिर्फ़ सैन्य और नेतृत्व स्तर पर हुए नुक़सान या नागरिक हताहतों तक सीमित नहीं थी। संसाधन भी खप गए, बुनियादी ढाँचा भी नुकसान में गया और राजनीतिक प्रक्रिया भी उलझ गई, खासकर सऊदी अरब के साथ। रियाद ने 2022 में यमन में शांति के लिए एक रूपरेखा पेश की थी।

यह आकलन बस विचार-विमर्श तक सीमित नहीं रहा। इसी से भीतर दो साफ़ धाराएँ बनीं।

पहली धारा: सावधानी

पहली धारा मानती है कि पिछला अनुभव यह दिखा चुका है कि सीधे कूदने से कोई रणनीतिक लाभ नहीं मिलता, बल्कि महंगे मोर्चे खुल जाते हैं। इस खेमे की राय है कि खुले टकराव से बचा जाए, मौजूदा समझौतों को बचाकर रखा जाए, खासकर सऊदी अरब के साथ, और कार्रवाई को राजनीतिक समर्थन या सीमित, नियंत्रित अभियानों तक रखा जाए। यानी ऐसा कुछ नहीं जो संगठन को एक बड़े युद्ध में घसीट ले जाए।

दूसरी धारा: प्रतिबद्धता

दूसरी धारा का मानना है कि मौजूदा समय ईरान द्वारा बनाए गए तथाकथित “प्रतिरोध की धुरी” के लिए निर्णायक है। इस खेमे के अनुसार अगर संगठन ने दूरी बनाई या हिचक दिखायी, तो युद्ध के बाद बनने वाले समीकरण में उसकी जगह कमज़ोर हो सकती है। इनके लिए यह अपनी मौजूदगी दर्ज कराने का मौक़ा है, खासकर तब जब संघर्ष फैल रहा हो और क्षेत्रीय ताक़तों का संतुलन बदलने की आशंका बढ़ रही हो।

हाल के हफ्तों में क्या हुआ

पिछले कुछ हफ्तों में हौथियों की फ़ैसला लेने की प्रक्रिया इन्हीं दो धाराओं के बीच चलती रही। नतीजा यह रहा कि संगठन न तो पूरी तरह युद्ध में कूदा और न ही पूरी तरह किनारे रहा। पहले महीने में राजनीतिक बयानबाज़ी तेज़ हुई। इसके बाद 27 मार्च से सीमित और सावधानी से गिने-चुने अभियान शुरू किए गए।

संदेश साफ़ था। धीरे-धीरे दख़ल बढ़ाने की बात कही गई, हालात पर नज़र रखने की ज़रूरत दोहराई गई और जानबूझकर उन सीमाओं को पार न करने की कोशिश की गई, जिन्हें संगठन के सैन्य प्रवक्ता ने लाल रेखाएँ बताया था। इनमें बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य से जुड़ी सीमाएँ भी शामिल थीं।

यह संतुलन कब तक चलेगा

फिर भी यह संतुलन स्थिर नहीं भी रह सकता। युद्ध जितना लंबा चलेगा और जितना क्षेत्रीय रूप से फैलेगा, उतना ही ईरानी और हौथी नेताओं की “मोर्चों की एकता” वाली भाषा तेज़ होगी। और जैसे-जैसे यह संघर्ष खिंचेगा, संगठन के लिए इस धुंधले मध्य क्षेत्र में बना रहना मुश्किल होता जाएगा। दबाव साफ़ तौर पर गहरे दख़ल की ओर बढ़ेगा।

हर नई घटना के साथ यह आंतरिक बहस किसी फ़ैसले के करीब पहुँच सकती है। एक रास्ता यह होगा कि सावधानी को दीर्घकालिक रणनीति बना दिया जाए। दूसरा रास्ता यह होगा कि संगठन व्यापक भागीदारी की ओर मुड़ जाए, और वह भी शायद उतनी धीरे-धीरे नहीं, जितना बयानबाज़ी में कहा गया था।

जो बात नहीं बदली

एक चीज़ स्थिर है। हौथी इस चरण में पिछले वर्षों के भारी अनुभव के साथ दाख़िल हुए हैं। वे जानते हैं कि दख़ल की क़ीमत क्या होती है। वे यह भी समझते हैं कि युद्ध में उतरना सिर्फ़ सैन्य फ़ैसला नहीं होता, बल्कि राजनीतिक, सुरक्षा और आर्थिक असर वाली एक लंबी प्रक्रिया होती है। अमेरिका और इज़राइल के साथ पिछली टकराहटों में वे यह क़ीमत पहले ही चुका चुके हैं।

अब सवाल यह नहीं रह गया है कि हौथी युद्ध में उतरेंगे या नहीं। असली सवाल यह है कि वे कैसे उतरेंगे और इसकी क़ीमत कितनी होगी। क्या वे अपनी भागीदारी पर सीमा लगा पाएँगे और उसे बनाए रख पाएँगे? क्या उनकी सोची-समझी एंट्री पूरे बिल से बचा लेगी? इन सवालों के जवाब आने वाले हफ्तों में और साफ़ होंगे।