क्या हुआ
यह बैक्टीरिया पहले मर चुका था, लेकिन वैज्ञानिकों ने उसमें दूसरी प्रजाति का डीएनए डालकर उसे फिर से सक्रिय कर दिया। इस तरह बना ‘ज़ॉम्बी बैक्टीरिया’ सिंथेटिक बायोलॉजी की उस पुरानी महत्वाकांक्षा का नया सबूत है, जिसमें सूक्ष्मजीवों को इस तरह बदला जाता है कि वे प्रकृति में मौजूद कामों तक सीमित न रहें। आदर्श स्थिति में ऐसे जीव दवा या जैव-ईंधन बनाने वाली छोटी-सी फैक्टरी बन जाते हैं। विज्ञान भी कभी-कभी सीधा नहीं चलता, तो सपने क्यों चलें।
यह प्रयोग अभी bioRxiv पर उपलब्ध है, यानी यह ऐसी शोध-रिपोर्ट है जो अब तक वैज्ञानिक समीक्षा की औपचारिक कसौटी पर नहीं गई है। इस काम के पीछे Craig Venter और सैन डिएगो स्थित उनका संस्थान J. Craig Venter Institute (JCVI) है।
पहली बार क्या अलग हुआ
अब तक बैक्टीरिया में बदलाव आम तौर पर उसी प्रजाति के डीएनए के साथ किए जाते थे। यह पहली बार है जब किसी बैक्टीरिया में दूसरी प्रजाति का डीएनए स्थानांतरित किया गया है।
यही इसे खास बनाता है। मतलब, वैज्ञानिक अब सिर्फ बैक्टीरिया को संपादित नहीं कर रहे, बल्कि उनके भीतर ऐसी जैविक सामग्री डाल रहे हैं जो सामान्यतः वहां होती ही नहीं।
इस काम की पृष्ठभूमि
यह नतीजा अचानक नहीं आया। यह उस रास्ते का पड़ाव है जिसकी शुरुआत 15 साल से भी पहले हुई थी। तब Venter के नेतृत्व वाली एक टीम ने पहली सिंथेटिक सेल तैयार की थी।
उस समय शोधकर्ताओं ने कंप्यूटर पर Mycoplasma mycoides नामक बैक्टीरिया का जीनोम बनाया, उसे संश्लेषित किया और इस तरह तैयार किया कि वह एक एंटीबायोटिक के प्रति प्रतिरोधी हो। फिर उस जीनोम को एक जीवित, लेकिन बहुत मिलते-जुलते बैक्टीरिया Mycoplasma capricolum में प्रतिरोपित किया गया।
इसके बाद के वर्षों में प्रगति हुई, लेकिन कोई निर्णायक छलांग नहीं लगी। वजह थी एक बुनियादी समस्या: यह भरोसेमंद तरीके से जांचना मुश्किल था कि नया सिंथेटिक डीएनए सचमुच काम कर रहा है या नहीं। वैज्ञानिकों के लिए यह ठीक वैसा ही है जैसा नई मशीन लगाकर यह सोचते रहना कि बटन दबाने पर वह वाकई कुछ करेगी या सिर्फ देखने में आधुनिक लगेगी।
‘ज़ॉम्बी’ क्यों बनाए गए
इसी समस्या से निपटने के लिए शोधकर्ताओं ने बैक्टीरिया को इस तरह बदला कि वे प्रजनन नहीं कर सकें। इससे उनके लिए बाहरी तौर पर मरना तय था, लेकिन वैज्ञानिकों ने उनके भीतर नया डीएनए डालकर उन्हें फिर से सक्रिय कर दिया।
जैसा कि Zumra Peksaglam Seidel ने कहा, ये बैक्टीरिया “मरने के लिए तय होते हैं, लेकिन हम उन्हें फिर से जीवित करते हैं।” Seidel JCVI में synthetic biologist हैं और इस शोध के लेखकों में शामिल हैं। टीम ने इन्हें इसलिए ‘cellule zombie’ यानी ज़ॉम्बी कोशिकाएँ कहना शुरू किया।
आगे क्या
शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि यही तकनीक भविष्य में दूसरी बैक्टीरियल प्रजातियों पर भी इस्तेमाल की जा सकेगी।
उनकी एक और बड़ी योजना है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता की मदद से डिजाइन किए गए जीनोम की कार्यक्षमता को परखना। यानी पहले कंप्यूटर पर जीनोम बनाया जाएगा, फिर उसे जीवित सिस्टम में आजमाया जाएगा। विज्ञान अब उस मुकाम पर पहुंच रहा है जहां बैक्टीरिया भी शायद अपना सीवी अपडेट कर रहे हैं।